हस्तिनापुरकी कुलीन रमणियाँ, जिनका चित्त भगवान् श्रीकृष्णमें रम गया था, आपसमें ऐसी बातें कर रही थीं, जो सबके कान और मनको आकृष्ट कर रही थीं ।।२०।। वे आपसमें कह रही थीं—‘सखियो! ये वे ही सनातनपरम पुरुष हैं, जो प्रलयके समय भी अपने अद्वितीय निर्विशेष स्वरूपमें स्थित रहते हैं। उस समय सृष्टिके मूल ये तीनों गुण भी नहीं रहते। जगदात्मा ईश्वरमें जीव भी लीन हो जाते हैं और महत्तत्त्वादि समस्त शक्तियाँ अपने कारण अव्यक्तमें सो जाती हैं ।।२१।। उन्होंने ही फिर अपने नाम-रूपरहित स्वरूपमें नामरूपके निर्माणकी इच्छा की तथा अपनी काल-शक्तिसे प्रेरित प्रकृतिका, जो कि उनके अंशभूत जीवोंको मोहित कर लेती है और सृष्टिकी रचनामें प्रवृत्त रहती है, अनुसरण किया और व्यवहारके लिये वेदादि शास्त्रोंकी रचना की ।।२२।। इस जगत्में जिसकेस्वरूपका साक्षात्कार जितेन्द्रिय योगी अपने प्राणोंको वशमें करके भक्तिसे प्रफुल्लित निर्मल हृदयमें किया करते हैं, ये श्रीकृष्ण वही साक्षात् परब्रह्म हैं। वास्तवमें इन्हींकी भक्तिसे अन्तःकरणकी पूर्ण शुद्धि हो सकती है, योगादिके द्वारा नहीं ।।२३।। सखी! वास्तवमें ये वही हैं, जिनकी सुन्दर लीलाओंका गायन वेदोंमें और दूसरे गोपनीय शास्त्रोंमें व्यासादि रहस्यवादी ऋषियोंने किया है—जो एक अद्वितीय ईश्वर हैं और अपनी लीलासे जगत्की सृष्टि, पालन तथा संहार करते हैं, परन्तु उनमें आसक्त नहीं होते ।।२४।। जब तामसी बुद्धिवाले राजा अधर्मसे अपना पेट पालने लगते हैं तब ये ही सत्त्वगुणको स्वीकारकर ऐश्वर्य, सत्य, ऋत, दया और यश प्रकट करते और संसारके कल्याणके लिये युग-युगमें अनेकों अवतार धारण करते हैं ।।२५।।
ब्रह्मा,अग्नि, सूर्य,इंद्र आदि देवता तथा यह संपूर्ण जगत प्रतीत होनेपर भी आप से पृथक नहीं है। इसलिए अनेक देवताओंका प्रतिपादन करनेवाले वेद-मंत्र उन देवताओंके नाम से पृथक-पृथक आपकी ही विभिन्न मूर्तियोंका वर्णन करते हैं। वस्तुत:आप अजन्मा है;उन मूर्तियोंके रूपमें भी आपका जन्म नहीं होता।1कुंती,2. भीष्म 3. कृष्ण गमन4. कृष्ण द्वारका,5. परीक्षित जन्म,6.विदुर धृत राष्ट्र,7. युधिस्टर अर्जुन8. परीक्षित को राज्य 9.पृथ्वी10.कलियुगदमन11.श्रृंगी ऋषि शाप
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